Thursday, July 18, 2013

होम डिलीवरी

                                                                                                                           03 July 2013

होम डिलीवरी

जब मुझे अकेले बाज़ार जाना हो, 
ये भी - वो भी सामान लाना हो, 
बुधवार को लिख के ले जाता हूँ,
ख़रीदकर जो लाना है साथ वो ...
..
पर - बिग बाज़ार की भीड़ में,
जब मैं ग़लत मुड़ जाता हूँ,
पता नही नज़र भटक जाती है,
सौदा कर जाती है मूक चीज़ों से ...
..
"...उल्जलूल सामान लाए हो .."
बस ये ताना मिलता है ....
हींग, अजीनो मोटो और पोछा किधर ?
ध्यान किधर होता है तुम्हारा ?
..
इसमे मेरा कोई कसूर नही,
दीखता है वो बिकता है ( सोचता हूँ मैं )
लिस्ट तो जेब मे ही रह जाती है,
नज़र तो फ्री फ्री और सेल के बोर्ड देखती है !
..
क्या ये सिर्फ़ मेरे साथ ही होता है,
या आप भी - खाते हो ताने ?
लंबी बिल की पर्ची में अंको के गणित में,
कितने बचाए एम आर पी के चक्कर में ...
..
इस द्वंद युद्ध में जुट जाते हो - उधेड़ बुन में,
रात दाल - रोटी का खाना ठंडा कर जाते हो,
माइक्रो का दरवाज़ा बंद होते ही -
पत्निजी का मुह खुल जाता है ....
..
मेरे साथ बैठकर दो रोटी खा लिया करो,
कटोरी दाल के लिए मुए माइक्रो को सताते हो ?
बिग बाज़ार का मेरा बुधवार का चक्कर ,
मुझे छोटा कर देता है - जेब से और तर्क से ....
..
फ़ैसला - अगली बार बिग बाज़ार नही,
सुपर मार्केट जाऊँगा सही सामान लाऊंगा,
वरना ... अगली से अगली बार तो -
नाकोड़ा की होम डिलीवरी ज़िंदाबाद ||




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