सोच
दूसरा इंसान कोई भी क्यूँ ना हो - आपका कितना भी अज़ीज़ क्यों ना हो , एक अनकही पहेली ही होता है / आप कुछ कह रहे रहे है पर क्या वह आपको सुन रहा है - आँखे और कान तो आपकी बात के दायरे मे हैं ज़रूर, पर दिमाग़ और मन ? इंसान हर वक़्त कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है / मां - बाबूजी - पति - पत्नी - भाई - बहन - बुवा - चाची कोई भी जब आपसे बात कर रहा हो तो क्या आपके मन में कोई और विचार नही मंडराते ? अवश्य ... कुछ आगे सोचते है , कुछ अपनी बात को ही सोच रहे है~ आपकी की बात तो सिर्फ़ कान के पर्दे से टकरा रही है .. उसके आगे ट्रॅफिक जाम है /
..
अब एक दुकानदार को ही लीजिए , आप दुकान में कदम रखते ही उसकी जीभ बाहर आ जाती है - अंकल या मेडम को कैसे चुना लगालु ... इनके हाथ मे तो बढ़िया गाड़ी की चाबी दिख रही है , बॅग भी काफ़ी महँगा लग रहा है , गुरु लपेट लो इनको आज ... पर उसे नही पता आप क्या सोच रहे हो ? आप तो बस एवी टाइम पास करने दुकान में ए.सी. की हवा खाने घुसे हो ...
..
पर एक पति - पत्नी को ही लीजिए ; बस कभी कभी ऐसा होता है की दोनों एक ही वक़्त में, एक ही बात, एक साथ कह जाते है ... और तब दोनों फिर कहते है "....तुम भी वही सोच रही थी जो मे सोच रहा था ..." /
.. काश ये अक्सर होता , घरों में होने वाला तीसरा विश्व युद्ध पहला बम फूटने से पहले ही सफेद झंडों के कलेवर मे आ जाएगा ... पर ऐसा नही है ... क्यूंकी आप मेरी बात पढ़ तो रहे थे मगर सोच कुछ और रहे थे .... क्यूँ है ना ?
.... अपनी अपनी सोच अपना - अपना मस्तिष्क ...
..
कितना माइलेज देती है ये १३५० ग्राम या सी. सी का ब्रेन पॉवर का एंजिन ....? हर वक़्त बस चलता ही रहता है .... मेरा चला तो मैने लिख दिया .. अब आपका चलेगा तो आप भी कुछ लिख देंगे तो दर्ज हो ही जाएगा कि आपके इंजन ने क्या कहा .....
दूसरा इंसान कोई भी क्यूँ ना हो - आपका कितना भी अज़ीज़ क्यों ना हो , एक अनकही पहेली ही होता है / आप कुछ कह रहे रहे है पर क्या वह आपको सुन रहा है - आँखे और कान तो आपकी बात के दायरे मे हैं ज़रूर, पर दिमाग़ और मन ? इंसान हर वक़्त कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है / मां - बाबूजी - पति - पत्नी - भाई - बहन - बुवा - चाची कोई भी जब आपसे बात कर रहा हो तो क्या आपके मन में कोई और विचार नही मंडराते ? अवश्य ... कुछ आगे सोचते है , कुछ अपनी बात को ही सोच रहे है~ आपकी की बात तो सिर्फ़ कान के पर्दे से टकरा रही है .. उसके आगे ट्रॅफिक जाम है /
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अब एक दुकानदार को ही लीजिए , आप दुकान में कदम रखते ही उसकी जीभ बाहर आ जाती है - अंकल या मेडम को कैसे चुना लगालु ... इनके हाथ मे तो बढ़िया गाड़ी की चाबी दिख रही है , बॅग भी काफ़ी महँगा लग रहा है , गुरु लपेट लो इनको आज ... पर उसे नही पता आप क्या सोच रहे हो ? आप तो बस एवी टाइम पास करने दुकान में ए.सी. की हवा खाने घुसे हो ...
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पर एक पति - पत्नी को ही लीजिए ; बस कभी कभी ऐसा होता है की दोनों एक ही वक़्त में, एक ही बात, एक साथ कह जाते है ... और तब दोनों फिर कहते है "....तुम भी वही सोच रही थी जो मे सोच रहा था ..." /
.. काश ये अक्सर होता , घरों में होने वाला तीसरा विश्व युद्ध पहला बम फूटने से पहले ही सफेद झंडों के कलेवर मे आ जाएगा ... पर ऐसा नही है ... क्यूंकी आप मेरी बात पढ़ तो रहे थे मगर सोच कुछ और रहे थे .... क्यूँ है ना ?
.... अपनी अपनी सोच अपना - अपना मस्तिष्क ...
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कितना माइलेज देती है ये १३५० ग्राम या सी. सी का ब्रेन पॉवर का एंजिन ....? हर वक़्त बस चलता ही रहता है .... मेरा चला तो मैने लिख दिया .. अब आपका चलेगा तो आप भी कुछ लिख देंगे तो दर्ज हो ही जाएगा कि आपके इंजन ने क्या कहा .....

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