" भाग मिल्खा भाग "
आज हर किसी के जीवन में तनाव है , ज़िंदगी पाने से पहले माता - पिता के चेहरे पर तनाव दीखता है , बच्चे के आने के बाद उसके लालन पालन , स्कूल, पोषण , कॉलेज, विवाह, घर, वैवाहिक जीवन सब कुछ सोचते - सोचते तनाव ही तो झेलते है हमारे माता - पिता | और हम भी इस चक्र व्यूह के अंग है ~ शुरू में वो तनाव महसूस नही होता पर जब ज़िम्मेदारियाँ सर पर आती है तो तनाव अपने आप दूसरों को भी नज़र आता है | स्कूल का काम पूरा करना हो या ऑफीस की डेड लाइन - सब तरफ़ तनाव , ई. एम. आई. घर के लिए या क़र्ज़ का भुगतान | हम हर वक़्त भागते ही रहते है - आधे रोग इसी तनाव की उपज है - किसी को मायग्रेन है तो किसी को बी पी , किसी को सिगरेट का शौक है तो किसी को दारू का .. बस इंसान अपनी इस दौड़ भाग की ज़िंदगी में खुद का ख़याल रख ही नही पता | मंडे टू फ्रायडे हो या मंडे टू सॅटअर्डे ...
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शुक्र है ~ बस रात को सोना ही अपने शरीर को अपने आप नसीब होता है ; वरना बाकी समय में तो बेचारा " शरीर " भी खुद तनाव में होता है - ये करूँ या वो करूँ .. बस पगला जाता है दिमाग़ | ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी को लगाम देने की ... बीच बीच में इंटरवेल करने की बेहद आवश्यकता है , वरना अँग्रेज़ी सिनेमा की तरह ९ - १० रील में ही " दी एंड" आ जाएगा ... सोचिए : २०१३ के छह महीने निकल गये , लगभग १८३ शाम तो फुर्र हो गयी ... अब तक क्या खोया क्या पाया - इसका " मिड ईयर रिव्यू " करने का वक़्त आ गया ...
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याद रहे घड़ी की सुई भी एक-एक सेकेंड ही आगे बढ़ती है ... बस हम ही है जो " भाग मिल्खा भाग " की कोशिश मे लगे रहते है ... इस जीवन के "लूटेरे" बन कर ... ज़रा होले होले चलो मेरे साजना .... आप का तनाव दूर करने के लिए बस इतनासा था यह प्रयास एक संवाद के रूप में -"भाग मिल्खा भाग " .... आप के क्या विचार है ? ... पॉप कॉर्न खाते खाते बात करले या तब भी समय नही है ... बातें .. बातें ... बातें जारी है ...बस अपनी ज़िंदगी की बात के लिए समय ही नही है ... Take a break in this race of life for " a HAPPY LIFE" ....
आज हर किसी के जीवन में तनाव है , ज़िंदगी पाने से पहले माता - पिता के चेहरे पर तनाव दीखता है , बच्चे के आने के बाद उसके लालन पालन , स्कूल, पोषण , कॉलेज, विवाह, घर, वैवाहिक जीवन सब कुछ सोचते - सोचते तनाव ही तो झेलते है हमारे माता - पिता | और हम भी इस चक्र व्यूह के अंग है ~ शुरू में वो तनाव महसूस नही होता पर जब ज़िम्मेदारियाँ सर पर आती है तो तनाव अपने आप दूसरों को भी नज़र आता है | स्कूल का काम पूरा करना हो या ऑफीस की डेड लाइन - सब तरफ़ तनाव , ई. एम. आई. घर के लिए या क़र्ज़ का भुगतान | हम हर वक़्त भागते ही रहते है - आधे रोग इसी तनाव की उपज है - किसी को मायग्रेन है तो किसी को बी पी , किसी को सिगरेट का शौक है तो किसी को दारू का .. बस इंसान अपनी इस दौड़ भाग की ज़िंदगी में खुद का ख़याल रख ही नही पता | मंडे टू फ्रायडे हो या मंडे टू सॅटअर्डे ...
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शुक्र है ~ बस रात को सोना ही अपने शरीर को अपने आप नसीब होता है ; वरना बाकी समय में तो बेचारा " शरीर " भी खुद तनाव में होता है - ये करूँ या वो करूँ .. बस पगला जाता है दिमाग़ | ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी को लगाम देने की ... बीच बीच में इंटरवेल करने की बेहद आवश्यकता है , वरना अँग्रेज़ी सिनेमा की तरह ९ - १० रील में ही " दी एंड" आ जाएगा ... सोचिए : २०१३ के छह महीने निकल गये , लगभग १८३ शाम तो फुर्र हो गयी ... अब तक क्या खोया क्या पाया - इसका " मिड ईयर रिव्यू " करने का वक़्त आ गया ...
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याद रहे घड़ी की सुई भी एक-एक सेकेंड ही आगे बढ़ती है ... बस हम ही है जो " भाग मिल्खा भाग " की कोशिश मे लगे रहते है ... इस जीवन के "लूटेरे" बन कर ... ज़रा होले होले चलो मेरे साजना .... आप का तनाव दूर करने के लिए बस इतनासा था यह प्रयास एक संवाद के रूप में -"भाग मिल्खा भाग " .... आप के क्या विचार है ? ... पॉप कॉर्न खाते खाते बात करले या तब भी समय नही है ... बातें .. बातें ... बातें जारी है ...बस अपनी ज़िंदगी की बात के लिए समय ही नही है ... Take a break in this race of life for " a HAPPY LIFE" ....

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