Friday, July 19, 2013
Thursday, July 18, 2013
भाग मिल्खा भाग
" भाग मिल्खा भाग "
आज हर किसी के जीवन में तनाव है , ज़िंदगी पाने से पहले माता - पिता के चेहरे पर तनाव दीखता है , बच्चे के आने के बाद उसके लालन पालन , स्कूल, पोषण , कॉलेज, विवाह, घर, वैवाहिक जीवन सब कुछ सोचते - सोचते तनाव ही तो झेलते है हमारे माता - पिता | और हम भी इस चक्र व्यूह के अंग है ~ शुरू में वो तनाव महसूस नही होता पर जब ज़िम्मेदारियाँ सर पर आती है तो तनाव अपने आप दूसरों को भी नज़र आता है | स्कूल का काम पूरा करना हो या ऑफीस की डेड लाइन - सब तरफ़ तनाव , ई. एम. आई. घर के लिए या क़र्ज़ का भुगतान | हम हर वक़्त भागते ही रहते है - आधे रोग इसी तनाव की उपज है - किसी को मायग्रेन है तो किसी को बी पी , किसी को सिगरेट का शौक है तो किसी को दारू का .. बस इंसान अपनी इस दौड़ भाग की ज़िंदगी में खुद का ख़याल रख ही नही पता | मंडे टू फ्रायडे हो या मंडे टू सॅटअर्डे ...
..
शुक्र है ~ बस रात को सोना ही अपने शरीर को अपने आप नसीब होता है ; वरना बाकी समय में तो बेचारा " शरीर " भी खुद तनाव में होता है - ये करूँ या वो करूँ .. बस पगला जाता है दिमाग़ | ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी को लगाम देने की ... बीच बीच में इंटरवेल करने की बेहद आवश्यकता है , वरना अँग्रेज़ी सिनेमा की तरह ९ - १० रील में ही " दी एंड" आ जाएगा ... सोचिए : २०१३ के छह महीने निकल गये , लगभग १८३ शाम तो फुर्र हो गयी ... अब तक क्या खोया क्या पाया - इसका " मिड ईयर रिव्यू " करने का वक़्त आ गया ...
..
याद रहे घड़ी की सुई भी एक-एक सेकेंड ही आगे बढ़ती है ... बस हम ही है जो " भाग मिल्खा भाग " की कोशिश मे लगे रहते है ... इस जीवन के "लूटेरे" बन कर ... ज़रा होले होले चलो मेरे साजना .... आप का तनाव दूर करने के लिए बस इतनासा था यह प्रयास एक संवाद के रूप में -"भाग मिल्खा भाग " .... आप के क्या विचार है ? ... पॉप कॉर्न खाते खाते बात करले या तब भी समय नही है ... बातें .. बातें ... बातें जारी है ...बस अपनी ज़िंदगी की बात के लिए समय ही नही है ... Take a break in this race of life for " a HAPPY LIFE" ....
आज हर किसी के जीवन में तनाव है , ज़िंदगी पाने से पहले माता - पिता के चेहरे पर तनाव दीखता है , बच्चे के आने के बाद उसके लालन पालन , स्कूल, पोषण , कॉलेज, विवाह, घर, वैवाहिक जीवन सब कुछ सोचते - सोचते तनाव ही तो झेलते है हमारे माता - पिता | और हम भी इस चक्र व्यूह के अंग है ~ शुरू में वो तनाव महसूस नही होता पर जब ज़िम्मेदारियाँ सर पर आती है तो तनाव अपने आप दूसरों को भी नज़र आता है | स्कूल का काम पूरा करना हो या ऑफीस की डेड लाइन - सब तरफ़ तनाव , ई. एम. आई. घर के लिए या क़र्ज़ का भुगतान | हम हर वक़्त भागते ही रहते है - आधे रोग इसी तनाव की उपज है - किसी को मायग्रेन है तो किसी को बी पी , किसी को सिगरेट का शौक है तो किसी को दारू का .. बस इंसान अपनी इस दौड़ भाग की ज़िंदगी में खुद का ख़याल रख ही नही पता | मंडे टू फ्रायडे हो या मंडे टू सॅटअर्डे ...
..
शुक्र है ~ बस रात को सोना ही अपने शरीर को अपने आप नसीब होता है ; वरना बाकी समय में तो बेचारा " शरीर " भी खुद तनाव में होता है - ये करूँ या वो करूँ .. बस पगला जाता है दिमाग़ | ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी को लगाम देने की ... बीच बीच में इंटरवेल करने की बेहद आवश्यकता है , वरना अँग्रेज़ी सिनेमा की तरह ९ - १० रील में ही " दी एंड" आ जाएगा ... सोचिए : २०१३ के छह महीने निकल गये , लगभग १८३ शाम तो फुर्र हो गयी ... अब तक क्या खोया क्या पाया - इसका " मिड ईयर रिव्यू " करने का वक़्त आ गया ...
..
याद रहे घड़ी की सुई भी एक-एक सेकेंड ही आगे बढ़ती है ... बस हम ही है जो " भाग मिल्खा भाग " की कोशिश मे लगे रहते है ... इस जीवन के "लूटेरे" बन कर ... ज़रा होले होले चलो मेरे साजना .... आप का तनाव दूर करने के लिए बस इतनासा था यह प्रयास एक संवाद के रूप में -"भाग मिल्खा भाग " .... आप के क्या विचार है ? ... पॉप कॉर्न खाते खाते बात करले या तब भी समय नही है ... बातें .. बातें ... बातें जारी है ...बस अपनी ज़िंदगी की बात के लिए समय ही नही है ... Take a break in this race of life for " a HAPPY LIFE" ....
होम डिलीवरी
03 July 2013
होम डिलीवरी
जब मुझे अकेले बाज़ार जाना हो,
ये भी - वो भी सामान लाना हो,
बुधवार को लिख के ले जाता हूँ,
ख़रीदकर जो लाना है साथ वो ...
..
पर - बिग बाज़ार की भीड़ में,
जब मैं ग़लत मुड़ जाता हूँ,
पता नही नज़र भटक जाती है,
सौदा कर जाती है मूक चीज़ों से ...
..
"...उल्जलूल सामान लाए हो .."
बस ये ताना मिलता है ....
हींग, अजीनो मोटो और पोछा किधर ?
ध्यान किधर होता है तुम्हारा ?
..
इसमे मेरा कोई कसूर नही,
दीखता है वो बिकता है ( सोचता हूँ मैं )
लिस्ट तो जेब मे ही रह जाती है,
नज़र तो फ्री फ्री और सेल के बोर्ड देखती है !
..
क्या ये सिर्फ़ मेरे साथ ही होता है,
या आप भी - खाते हो ताने ?
लंबी बिल की पर्ची में अंको के गणित में,
कितने बचाए एम आर पी के चक्कर में ...
..
इस द्वंद युद्ध में जुट जाते हो - उधेड़ बुन में,
रात दाल - रोटी का खाना ठंडा कर जाते हो,
माइक्रो का दरवाज़ा बंद होते ही -
पत्निजी का मुह खुल जाता है ....
..
मेरे साथ बैठकर दो रोटी खा लिया करो,
कटोरी दाल के लिए मुए माइक्रो को सताते हो ?
बिग बाज़ार का मेरा बुधवार का चक्कर ,
मुझे छोटा कर देता है - जेब से और तर्क से ....
..
फ़ैसला - अगली बार बिग बाज़ार नही,
सुपर मार्केट जाऊँगा सही सामान लाऊंगा,
वरना ... अगली से अगली बार तो -
नाकोड़ा की होम डिलीवरी ज़िंदाबाद ||
होम डिलीवरी
जब मुझे अकेले बाज़ार जाना हो,
ये भी - वो भी सामान लाना हो,
बुधवार को लिख के ले जाता हूँ,
ख़रीदकर जो लाना है साथ वो ...
..
पर - बिग बाज़ार की भीड़ में,
जब मैं ग़लत मुड़ जाता हूँ,
पता नही नज़र भटक जाती है,
सौदा कर जाती है मूक चीज़ों से ...
..
"...उल्जलूल सामान लाए हो .."
बस ये ताना मिलता है ....
हींग, अजीनो मोटो और पोछा किधर ?
ध्यान किधर होता है तुम्हारा ?
..
इसमे मेरा कोई कसूर नही,
दीखता है वो बिकता है ( सोचता हूँ मैं )
लिस्ट तो जेब मे ही रह जाती है,
नज़र तो फ्री फ्री और सेल के बोर्ड देखती है !
..
क्या ये सिर्फ़ मेरे साथ ही होता है,
या आप भी - खाते हो ताने ?
लंबी बिल की पर्ची में अंको के गणित में,
कितने बचाए एम आर पी के चक्कर में ...
..
इस द्वंद युद्ध में जुट जाते हो - उधेड़ बुन में,
रात दाल - रोटी का खाना ठंडा कर जाते हो,
माइक्रो का दरवाज़ा बंद होते ही -
पत्निजी का मुह खुल जाता है ....
..
मेरे साथ बैठकर दो रोटी खा लिया करो,
कटोरी दाल के लिए मुए माइक्रो को सताते हो ?
बिग बाज़ार का मेरा बुधवार का चक्कर ,
मुझे छोटा कर देता है - जेब से और तर्क से ....
..
फ़ैसला - अगली बार बिग बाज़ार नही,
सुपर मार्केट जाऊँगा सही सामान लाऊंगा,
वरना ... अगली से अगली बार तो -
नाकोड़ा की होम डिलीवरी ज़िंदाबाद ||
वापसी की तारीख -
04 July 2013
वापसी की तारीख -
पता नही कहाँ तक,
चले गये वो अभागे,
पानी का ऐसा आक्रोश,
उनके जज़्बे को डुबो गया ...
..
अब तक ना आए,
अब कब आओगे,
कहाँ खोजे आपको ?
कोई निशान ही नही ...
..
अकेला सफ़र अब शुरू,
अर्थ हीन दिशा हीन बरबस,
आपके बिना ज़िंदगी का गुरूर,
झेलना होगा इस त्रासदी को ...
..
आपने भी तो आत्मसात किया,
उस बहती धारा के रौद्र रूप को,
कैसा रहा होगा वो सैलाब,
मां बाबूजी हम कुछ ना कर पाए ...
..
कहाँ खोजे आपको,
इस १५ जुलाई तक ?
अब बस उपर ही मिलेंगे ,
हम तो यहाँ अनाथ हो गये है ....
( सरकारी सूचना : त्रासदी में गुम व्यक्तियों को 15 जुलाई के बाद मृत मान लिया जाएगा ) ..... सब्र - आक्रोश - अफ़सोस से दो - दो हाथ ... हमारी संवेदना बस शब्दों में ~
04 July 2013
वापसी की तारीख -
पता नही कहाँ तक,
चले गये वो अभागे,
पानी का ऐसा आक्रोश,
उनके जज़्बे को डुबो गया ...
..
अब तक ना आए,
अब कब आओगे,
कहाँ खोजे आपको ?
कोई निशान ही नही ...
..
अकेला सफ़र अब शुरू,
अर्थ हीन दिशा हीन बरबस,
आपके बिना ज़िंदगी का गुरूर,
झेलना होगा इस त्रासदी को ...
..
आपने भी तो आत्मसात किया,
उस बहती धारा के रौद्र रूप को,
कैसा रहा होगा वो सैलाब,
मां बाबूजी हम कुछ ना कर पाए ...
..
कहाँ खोजे आपको,
इस १५ जुलाई तक ?
अब बस उपर ही मिलेंगे ,
हम तो यहाँ अनाथ हो गये है ....
( सरकारी सूचना : त्रासदी में गुम व्यक्तियों को 15 जुलाई के बाद मृत मान लिया जाएगा ) ..... सब्र - आक्रोश - अफ़सोस से दो - दो हाथ ... हमारी संवेदना बस शब्दों में ~
पता नही कहाँ तक,
चले गये वो अभागे,
पानी का ऐसा आक्रोश,
उनके जज़्बे को डुबो गया ...
..
अब तक ना आए,
अब कब आओगे,
कहाँ खोजे आपको ?
कोई निशान ही नही ...
..
अकेला सफ़र अब शुरू,
अर्थ हीन दिशा हीन बरबस,
आपके बिना ज़िंदगी का गुरूर,
झेलना होगा इस त्रासदी को ...
..
आपने भी तो आत्मसात किया,
उस बहती धारा के रौद्र रूप को,
कैसा रहा होगा वो सैलाब,
मां बाबूजी हम कुछ ना कर पाए ...
..
कहाँ खोजे आपको,
इस १५ जुलाई तक ?
अब बस उपर ही मिलेंगे ,
हम तो यहाँ अनाथ हो गये है ....
( सरकारी सूचना : त्रासदी में गुम व्यक्तियों को 15 जुलाई के बाद मृत मान लिया जाएगा ) ..... सब्र - आक्रोश - अफ़सोस से दो - दो हाथ ... हमारी संवेदना बस शब्दों में ~
अवाक्स : आसमान में आँखे
07 July 2013 Sunday
इस रविवार लोकमत समाचार , नागपुर ( सह प्रकाशन - अकोला, औरंगाबाद, कोल्हापुर, जलगाव और पुणे ) के रविवारीय परिशिष्ठ " लोकरंग " मे मेरे द्वारा लिखा लेख " अवाक्स : आसमान में आँखे " प्रकाशित हुआ है |
.. अख़बार की लिंक नीचे दी हुई है | ... समय मिले तो पढ़िए ..
http://epaper.lokmat.com/lokmatsamachar/newsview.aspx?eddate=07/07/2013&pageno=4&edition=68&prntid=31358&bxid=27995602&pgno=4
व्हीलर आइलॅंड से हवा में अग्नि
14 July 2013
इस रविवार लोकमत समाचार , नागपुर ( सह प्रकाशन - अकोला, औरंगाबाद, छिंदवाड़ा, कोल्हापुर, जलगाव और पुणे ) के रविवारीय परिशिष्ठ " लोक रंग " मे मेरे द्वारा लिखा लेख " व्हीलर आइलॅंड से हवा में अग्नि " प्रकाशित हुआ है | अग्नि मिसाइल के तकनीकी और अन्य रोचक पहलू इस लेख मे शामिल है | लगभग ३० वर्षो के अथक परिश्रम के पश्चात भारतीय वैज्ञानिकों को अपार सफलता मिली है - डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम के मार्गदर्शन मे शुरू हुए इस अभियान में अभी बहुत कुछ बाकी है ...
.. अख़बार की लिंक नीचे दी हुई है |
http://epaper.lokmat.com/lokmatsamachar/newsview.aspx?eddate=07/14/2013&pageno=4&edition=68&prntid=31682&bxid=28177954&pgno=4
इस रविवार लोकमत समाचार , नागपुर ( सह प्रकाशन - अकोला, औरंगाबाद, छिंदवाड़ा, कोल्हापुर, जलगाव और पुणे ) के रविवारीय परिशिष्ठ " लोक रंग " मे मेरे द्वारा लिखा लेख " व्हीलर आइलॅंड से हवा में अग्नि " प्रकाशित हुआ है | अग्नि मिसाइल के तकनीकी और अन्य रोचक पहलू इस लेख मे शामिल है | लगभग ३० वर्षो के अथक परिश्रम के पश्चात भारतीय वैज्ञानिकों को अपार सफलता मिली है - डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम के मार्गदर्शन मे शुरू हुए इस अभियान में अभी बहुत कुछ बाकी है ...
.. अख़बार की लिंक नीचे दी हुई है |
http://epaper.lokmat.com/lokmatsamachar/newsview.aspx?eddate=07/14/2013&pageno=4&edition=68&prntid=31682&bxid=28177954&pgno=4
. -..--.
. -..--.
ज़िंदा दफ़नाया तुम्हे,
हमें दुख बहुत हुआ,
क्या करते हम,
उपर से हुकुम था,
163 साल के हो गये,
एक दिन तो जाना ही था,
हम याद रखेंगे तुम्हे...
..
तुम्हारी सीधे शब्दो की बाते,
गुलाबी मजमून,
बस दो मोड़ होते,
मिलते ही साँसे थम जाती,
पता नही कैसे है,
तुम बोलते कम - लिखते अपर केस में,
हम याद रखेंगे तुम्हे...
..
जन्म - मृत्यु पास - फेल शादी - बर्बादी,
सबका हाल तुमने ही दिया,
हमने घर बैठे बस साइन किया,
ये तब था जब ये काले - गोरे,
बड़े - छोटे भाई एस एम एस नही थे,
हम याद रखेंगे तुम्हे....
..
बस तुम ही जो जल्द आ जाते थे,
साइकल पर दशहरा - दीवाली पर,
होली और ईद पर कुछ ले जाते,
हम खुशी - खुशी दे देते तुम्हे,
अलबिदा कैसे लिखू ,
कोई संख्या नही कोड की,
हम याद रखेंगे तुम्हे....
..
कहाँ खोजेंगे हम तुम्हे,
बहुत प्यारे थे हमारी ज़िंदगी में,
देखे हमने वो तुम्हारे मजमून,
जिसे हिन्दी में " तार ",
अँग्रेज़ी में " टेलीग्राम " कहते,
मगर आते लिफाफे में बंद,
हम याद रखेंगे तुम्हे ...
अलविदा . - .. - ...
डा ... डिट ... डा ...
ज़िंदगी जीने का जज़्बा :
भारत में पहली बार मुंबई में सिलसिलेवार पाँच परिवारों ने एक दूसरे को "गुर्दे" ( किड्नी ) दान मे दिए और उनका प्रत्यारोपण एक ही दिन हुआ | एक साथ दस ऑपरेशन सफलतापूर्वक किए गये | यह खबर २६ जून को अख़बारों की सुर्खिया थी | इसके सामाजिक और परिवारिक पहलू पर मेरे द्वारा लिखा एक लेख - ज़िंदगी जीने का जज़्बा : नई दिल्ली से प्रकाशित " उत्कर्ष मेल" के १५ - ३१ जुलाई के अंक मे प्रकाशित हुआ है | लिंक साथ है - लिंक पर राइट क्लिक करे और नयी विंडो मे खोले , फिर कर्सर को चित्र पर ले जाए और बड़ा करने के लिए लेफ्ट क्लिक करे .... समय मिले तो पढ़िए |
मिस्ड कॉल
उत्ताराखंड की त्रासदी को अब तक कोई भुला ना पाया है ... जिन्हे छोड़ कर गये थे अपने , उनका अब तक कोई अता - पता नही ... खुदा का कहर था जो अलकनंदा की लहरों मे पता नही कितनी ज़िंदगियाँ अतीत मे खो गयी ... शोक संतप्त परिवारों को कौन दिलासा देगा ... पानी से ख़ौफ़ पैदा हो गया है, पर आँखों में आँसू थमते नही है ... सैलाब रुकता नही जब अपने कहीं खो जाते है - वापसी की टिकिट जेब मे हो पर वापसी के मुसाफिर का ही पता नही .. अफ़सोस ... नमन उन श्रधालुओं को जो गये थे उम्मीदों से पर घर ना लौटे ....
भगवान के दर्शन की तमन्ना थी
वे चल पड़े लेकर मां को साथ
सब कुछ लिया था साथ
स्वेटर , स्कार्फ , गरम मोजे
तीन जोड़ी कपड़े , एक टोपी,
मां की दवाइयाँ , कमर का पट्टा,
मोबाइल , चारजर, टॉर्च, माचिस
क्रेडिट कार्ड, पोलिथीन में पैसे,
गंगा जल के लिए बोतल,
सब कुछ ले लिया था साथ ...
..
जाने का रिज़र्वेशन तारीख तय थी,
वापसी की टिकेट अलग से रख ली,
बचपन मे कभी गये थे बद्री केदार,
अब मां संग पाना था पुण्य,
रोज दो - तीन बार बात होती,
खाने पीने की सलाह होती,
केदार के दर्शन हो गये ,
अब बद्री की तरफ निगाह गयी
दूर पर्वतों पर बर्फ ही बर्फ थी
मां थोड़ी विचलित सर्द थी ....
..
पापा बोले " मैं हूँ ना ..."
हमे मोबाइल पर खबर दी
मिस्ड कॉल ही था वो
... सभी लाइन व्यस्त है
आप कतार में है,
कृपया प्रतीक्षा करे ....
बस मां - बाबूजी आप -
मोबाइल की तरंगों मे या
अलकनंदा की तरंगों मे ,
मिस्ड " कॉल " था वो
..
कहाँ रह गये
बस आँखों के पानीमें
बोझिल हो गये
सब कुछ ले लिया था साथ ...
और पंद्रह तारीख भी
आ गयी ...
पापा - मां -
अब कब आओगे ?
हम कहाँ खोजे आपको
वो मिस्ड " काल" कहाँ ढूँढे ?
......
- कर्नल ( सेवा निवृत्त) सारंग थत्ते
सोच
सोच
दूसरा इंसान कोई भी क्यूँ ना हो - आपका कितना भी अज़ीज़ क्यों ना हो , एक अनकही पहेली ही होता है / आप कुछ कह रहे रहे है पर क्या वह आपको सुन रहा है - आँखे और कान तो आपकी बात के दायरे मे हैं ज़रूर, पर दिमाग़ और मन ? इंसान हर वक़्त कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है / मां - बाबूजी - पति - पत्नी - भाई - बहन - बुवा - चाची कोई भी जब आपसे बात कर रहा हो तो क्या आपके मन में कोई और विचार नही मंडराते ? अवश्य ... कुछ आगे सोचते है , कुछ अपनी बात को ही सोच रहे है~ आपकी की बात तो सिर्फ़ कान के पर्दे से टकरा रही है .. उसके आगे ट्रॅफिक जाम है /
..
अब एक दुकानदार को ही लीजिए , आप दुकान में कदम रखते ही उसकी जीभ बाहर आ जाती है - अंकल या मेडम को कैसे चुना लगालु ... इनके हाथ मे तो बढ़िया गाड़ी की चाबी दिख रही है , बॅग भी काफ़ी महँगा लग रहा है , गुरु लपेट लो इनको आज ... पर उसे नही पता आप क्या सोच रहे हो ? आप तो बस एवी टाइम पास करने दुकान में ए.सी. की हवा खाने घुसे हो ...
..
पर एक पति - पत्नी को ही लीजिए ; बस कभी कभी ऐसा होता है की दोनों एक ही वक़्त में, एक ही बात, एक साथ कह जाते है ... और तब दोनों फिर कहते है "....तुम भी वही सोच रही थी जो मे सोच रहा था ..." /
.. काश ये अक्सर होता , घरों में होने वाला तीसरा विश्व युद्ध पहला बम फूटने से पहले ही सफेद झंडों के कलेवर मे आ जाएगा ... पर ऐसा नही है ... क्यूंकी आप मेरी बात पढ़ तो रहे थे मगर सोच कुछ और रहे थे .... क्यूँ है ना ?
.... अपनी अपनी सोच अपना - अपना मस्तिष्क ...
..
कितना माइलेज देती है ये १३५० ग्राम या सी. सी का ब्रेन पॉवर का एंजिन ....? हर वक़्त बस चलता ही रहता है .... मेरा चला तो मैने लिख दिया .. अब आपका चलेगा तो आप भी कुछ लिख देंगे तो दर्ज हो ही जाएगा कि आपके इंजन ने क्या कहा .....
दूसरा इंसान कोई भी क्यूँ ना हो - आपका कितना भी अज़ीज़ क्यों ना हो , एक अनकही पहेली ही होता है / आप कुछ कह रहे रहे है पर क्या वह आपको सुन रहा है - आँखे और कान तो आपकी बात के दायरे मे हैं ज़रूर, पर दिमाग़ और मन ? इंसान हर वक़्त कुछ ना कुछ सोचता ही रहता है / मां - बाबूजी - पति - पत्नी - भाई - बहन - बुवा - चाची कोई भी जब आपसे बात कर रहा हो तो क्या आपके मन में कोई और विचार नही मंडराते ? अवश्य ... कुछ आगे सोचते है , कुछ अपनी बात को ही सोच रहे है~ आपकी की बात तो सिर्फ़ कान के पर्दे से टकरा रही है .. उसके आगे ट्रॅफिक जाम है /
..
अब एक दुकानदार को ही लीजिए , आप दुकान में कदम रखते ही उसकी जीभ बाहर आ जाती है - अंकल या मेडम को कैसे चुना लगालु ... इनके हाथ मे तो बढ़िया गाड़ी की चाबी दिख रही है , बॅग भी काफ़ी महँगा लग रहा है , गुरु लपेट लो इनको आज ... पर उसे नही पता आप क्या सोच रहे हो ? आप तो बस एवी टाइम पास करने दुकान में ए.सी. की हवा खाने घुसे हो ...
..
पर एक पति - पत्नी को ही लीजिए ; बस कभी कभी ऐसा होता है की दोनों एक ही वक़्त में, एक ही बात, एक साथ कह जाते है ... और तब दोनों फिर कहते है "....तुम भी वही सोच रही थी जो मे सोच रहा था ..." /
.. काश ये अक्सर होता , घरों में होने वाला तीसरा विश्व युद्ध पहला बम फूटने से पहले ही सफेद झंडों के कलेवर मे आ जाएगा ... पर ऐसा नही है ... क्यूंकी आप मेरी बात पढ़ तो रहे थे मगर सोच कुछ और रहे थे .... क्यूँ है ना ?
.... अपनी अपनी सोच अपना - अपना मस्तिष्क ...
..
कितना माइलेज देती है ये १३५० ग्राम या सी. सी का ब्रेन पॉवर का एंजिन ....? हर वक़्त बस चलता ही रहता है .... मेरा चला तो मैने लिख दिया .. अब आपका चलेगा तो आप भी कुछ लिख देंगे तो दर्ज हो ही जाएगा कि आपके इंजन ने क्या कहा .....
Wednesday, July 17, 2013
Subscribe to:
Posts (Atom)




















